हिंसा से विचार नहीं मरता, इससे व्यवस्था को तर्क मिलता हैं : रघु ठाकुर की गर्जना, डॉ. लोहिया की धान से बनी प्रतिमा के अनावरण पर समाजवादी चेतना का उत्सव
उमरादेहान/ धमतरी (छत्तीसगढ़)। नगरी-सिहावा की शांत वनगंधित भूमि आज एक बार फिर इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई, जब यहां के आदिवासियों ने अपने श्रम और श्रद्धा से एकत्रित धान से डॉ. राममनोहर लोहिया की प्रतिमा का निर्माण और अनावरण किया। इस ऐतिहासिक अवसर पर मंच से गूंजती एक आवाज़ ने सभी उपस्थितों को झकझोर दिया वह आवाज़ थी वरिष्ठ समाजवादी चिंतक व विचारक श्री रघु ठाकुर की, जिन्होंने स्पष्ट कहा कि “हिंसा से विचार नहीं मरता, हिंसा तो केवल व्यवस्था को तर्क देती है। विचार तो जेल, जनांदोलन और जनबल से जीवित रहते हैं।” यह सभा केवल एक प्रतिमा अनावरण या भाषण का आयोजन नहीं थी, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन का पुनर्जन्म थी। यहां से निकली आवाज़—: आदिवासी अधिकार, अहिंसक, आंदोलन, समाजवादी विचार, और लोकतांत्रिक चेतना अब दिल्ली की सड़कों और संसद के गलियारों तक जाएगी।

*धान की मूर्ति, आंदोलन की मूर्ति—:* यह कोई साधारण प्रतिमा नहीं, बल्कि एक-एक किलो धान से बनी मूर्ति है जिसे आदिवासी समाज ने अपने संकल्प और समर्पण से तैयार किया है। यह केवल लोहिया को श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उनके विचारों की पुनर्प्रतिष्ठा है।
रघु ठाकुर ने इसे “अहिंसा का तीर्थ” बताते हुए कहा कि “इस अंचल की चार पीढ़ियों ने अपने अधिकारों के लिए जेल की यात्रा करके यह साबित कर दिया कि दुनिया को बदलने का सबसे बड़ा माध्यम जेल है, बंदूक या हिंसा नहीं। नगरी सिहावा अंचल हिंसाग्रस्त वनांचल में अहिंसा के टापू की तरह है। नक्सली हिंसा में दोनों तरफ से आदिवासी ही मर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को भी समझना होगा कि बंदूक की गोली से हिंसा तो मर सकती है, पर विचार नहीं। नगरी सिहावा अंचल के उमरादेहान जैसे गांवों से देश में यह संदेश जाना चाहिए।
*डॉ. लोहिया से रघु ठाकुर तक: संघर्ष की पीढ़ियां*
रघु ठाकुर ने अपने ओजस्वी भाषण में उस संघर्ष की स्मृति कराई, जो 1950 के दशक में डॉ. लोहिया ने इसी अंचल से शुरू किया था, जब आदिवासियों के भूमि अधिकार के लिए पहली बार आवाज़ उठी थी। उन्होंने कहा कि “इस अंचल की चार पीढ़ियों ने जेल यात्राएं कीं, पर कभी माफ़ी नहीं मांगी। यही असली आंदोलन है।”
*संसद से संवाद तक: संजय सिंह का भरोसा—:* राज्यसभा सांसद संजय सिंह, जो इस आयोजन में मुख्य अतिथि थे, उन्होंने कहा कि “जब तक समाज में गैर-बराबरी है, समाजवाद जिंदा रहेगा। और हम आदिवासियों की आवाज़ को संसद के हर सत्र में बुलंद करते रहेंगे” उन्होंने रघु ठाकुर को “समाजवाद का ज़मीन से जुड़ा योद्धा” बताया और कहा कि “मैंने राजनीति का पहला पाठ रघु जी से ही सीखा है”
*बारिश नहीं डिगा सकी विश्वास, दृढ़ता की मिसाल बनी सभा—:* जब बारिश ने मंच और मैदान को घेर लिया, तब भी हजारों आदिवासी महिलाएं, युवक और बुज़ुर्ग अपनी जगह बैठे रहे। यह केवल उपस्थिति नहीं, बल्कि विश्वास की पराकाष्ठा थी। “जिस जनता के पास धान है, संकल्प है और चेतना है वह किसी भी सत्ता को चुनौती दे सकती है”
*बस्तर से उमरादेहान तक: शांति का संदेश—:* बस्तर के हिंसाग्रस्त क्षेत्रों कोंडागांव, नारायणपुर और कांकेर से बड़ी संख्या में आदिवासी इस कार्यक्रम में आए। इस दौरान उन्होंने कहा उन्होंने कहा कि “हम रघु ठाकुर जी को बस्तर बुलाना चाहते हैं, ताकि नगरी-सिहावा जैसी शांति की मिसाल हमारे यहां भी कायम हो सके”
*राजनीतिक एकता, सामाजिक चेतना—:* इस आयोजन में हर विचारधारा के प्रतिनिधि शामिल हुए जिनमें मोतीलाल बोरा के पुत्र पूर्व विधायक अरुण वोरा, अमृत संदेश के संपादक राजीव वोरा, लोसपा के श्यामसुंदर सिंह यादव राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, राष्ट्रीय महासचिव अरुण प्रताप सिंह, राष्ट्रीय व प्रांतीय नेता जयंत सिंह तोमर, डॉ. शिवा श्रीवास्तव, अशोक पंडा, श्याम मनोहर सिंह, कांग्रेस नेता रामकुमार पचौरी, वंशी श्रीमाली, समाजवादी कार्यकर्ता गोपाल साहू, अशोक योग गुरु, बबीता जी और भाजपा-जदयू के स्थानीय पदाधिकारी। इस दौरान सभी ने एक स्वर में समाजवाद की पुनर्परिभाषा और अहिंसा आधारित आंदोलन की पुनर्स्थापना की बात कही।
*शिक्षा में आंदोलन का इतिहास हो—:* रघु ठाकुर ने कहा कि “नगरी-सिहावा के ऐतिहासिक अहिंसक आंदोलनों को विद्यालय और विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा और जनसंघर्ष की शक्ति को समझ सके”
*एनजीओ संस्कृति पर तीखा प्रहार—:* अपने भाषण में रघु ठाकुर ने कहा कि 1990 के बाद राजनीति में आई एनजीओ संस्कृति को लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताया। उन्होंने कहा कि “एनजीओ के भरोसे समाज नहीं बदलेगा, समाज बदलता है आंदोलन, जोखिम और जनबल से”
*उद्योग में आदिवासी की हिस्सेदारी की मां—:* रघु ठाकुर ने स्पष्ट कहा कि यदि आदिवासी क्षेत्रों में उद्योग लगाए जाएं, तो वहां के लोगों को 25% अंशधारी बनाना अनिवार्य किया जाए। उन्होंने इसे आर्थिक न्याय का मूल मंत्र बताया और कहा कि “यह मुद्दा केवल भाषण नहीं, आगामी आंदोलनों का घोषवाक्य बनेगा”
*सभा का समापन कविता में क्रांति की गूंज—:* राजनांदगांव से आए कवि रामकुमार तिवारी ने धन्यवाद ज्ञापन के रूप में एक कविता सुनाई, उन्होंने कहा कि
“धान से बनी मूर्ति बोले,
जन की चेतना डोले,
नगरी की धरती गाती है—
संघर्ष कभी न अकेला होगा.












