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नेकी की दीवार… खुद जर्जर हालत में, क्या हमारी संवेदनाएं भी हो गईं कमजोर?

भिंड. कभी यही “नेकी की दीवार” गरीबों, जरूरतमंदों और मजलूमों के लिए उम्मीद की एक किरण हुआ करती थी।
यहां टंगे कपड़े सिर्फ कपड़े नहीं होते थे… बल्कि किसी ठिठुरती रात में गर्माहट, किसी बेबस इंसान के लिए सम्मान और समाज की संवेदनशीलता का प्रतीक होते थे।

लेकिन आज वही दीवार खुद जर्जर हालत में खड़ी है…
टूटी हुई, सूनी, और जैसे अपने ही वजूद पर सवाल कर रही हो।

जहां कभी लोगों की भीड़ लगती थी—अपनी जरूरत से ज्यादा चीजें छोड़ जाने की भावना के साथ,आज वहां सन्नाटा पसरा है।न कपड़े, न मदद का वो जज़्बा… सिर्फ खालीपन।

सवाल उठता है—
क्या हमारे “श्रद्धा के सुमन” मुरझा गए हैं?
क्या हमारी इंसानियत अब सिर्फ शब्दों तक सीमित रह गई है?

समाज की असली पहचान उसकी तरक्की से नहीं,
बल्कि उसके कमजोर और जरूरतमंद लोगों के प्रति व्यवहार से होती है।

“नेकी की दीवार” सिर्फ एक जगह नहीं थी,
वो एक सोच थी… एक आंदोलन था…
जो आज हमारी अनदेखी के कारण दम तोड़ता नजर आ रहा है।

जरूरत है फिर से उसी भावना को जगाने की…
अपने आसपास देखने की…और एक बार फिर उस दीवार को कपड़ों से नहीं,
बल्कि अपनी इंसानियत से भरने की।

क्योंकि…
किसी के तन को ढकने से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।

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